सोमवार, 23 अगस्त 2010

भ्रष्‍टाचार को मिले कानूनी मान्‍यता !

मैं दुखी हूं. मेरा पड़ोसी भी दुखी है. दुखी इसलिए हैं कि खेल हो रहा है. मामला तो एक है पर हमारे दुख के कारण अलग अलग हैं. कॉमनवेल्‍थ खेल को लेकर जिस तरह का नोचा नोची शुरू हुई है, उससे देश के लोग भी बहुत दुखी हैं. जाहिर सी बात है, देश में बड़ा खेल हो रहा है तो ऐसा खेल होना ही था. इतने बड़े खेल की आशंका किसी को नहीं थी, जितना बड़ा इस खेल को बना दिया गया है. वैसे भी इस तरह के बड़े आयोजन खेल करने के लिए ही किए जाते हैं. टाइम से सारी तैयारियां हो जाती तो फिर खेल का मतलब ही क्‍या? अतिरिक्‍त टाइम में ही तो खेल में असली रोमांच आता है. देश में खेलों के साथ खेल काफी पहले से होता आ रहा है, तब कभी भी हमने भौं-भौं नहीं की. अब कुछ 'अरबों' का 'खेल' हो गया तो काफी लोग खेलने और काटने की कोशिश में लग गए हैं.

अब अपने सुरेश कलमाड़ी और उनकी टीम ने कॉमन लोगों के वेल्‍थ के साथ थोड़ा सा खेल क्‍या कर दिया, सबलोग पूरी टीम को 'सुरसा' की तरह मुंह खोलकर 'काला पाणी' की सजा देने की थुथुनजोरी करने लगे हैं. आखिर क्‍या रखा है इसमें, अरे जांच होने से रही, अगर जांच हुई भी तो रिपोर्ट आने से पहले बेचारे कितने भगवान को प्‍यारे हो चुके होंगे. अपने देश में घोटाला कोई हल्‍ला करने जैसी बात नहीं है. कितने घोटाले हुए, क्‍या बिगाड़ लिया किसी ने. इसलिए शांति के साथ दूसरे खेलों के बारे में सुनने व जानने की तैयारी करनी चाहिए.
 
वैसे चर्चा कुछ दुखी लोगों की हो रही थी. कुछ लोगों के दुख का कारण हैं कि इस खेल के खेल में उन्‍हें कोई फायदा नहीं हुआ. जबकि कई ऐसे लोग हैं जो इसलिए दुखी हैं कि इस खेल के खेल में उनके दुश्‍मनों का खेल बढि़या हो गया. कुछ इसलिए परेशान हैं कि उनका भी खेल हो जाता तो कॉमन लोगों का वेल्‍थ उनकी हेल्‍थ सुधार देता. एक फीसदी ऐसे लोग हैं जो खेल का खेल करने वाले विभाग में अधिकारी नहीं है, वे अपने किस्‍मत को कोस रहे हैं, क्‍यों नहीं मैं एमसीडी, सीपीडब्‍ल्‍यूडी, पीडब्‍ल्‍यूडी, एनडीएमसी, आयोजन समिति या ऐसे ही किसी विभाग का अधिकारी या कर्मचारी बन पाया. एक ही फीसदी ऐसे लोग हैं, जो बेचारे माइक-आईडी और कलम-कॉपी लेकर घूम रहे हैं, तिहाई इस उम्‍मीद में कि इस खेल से हमारे खेलने खाने के दिन बहुरे, शेष इसलिए कि उनका नाम सुधरे. कुछ फीसदी लोग इसलिए परेशान हैं कि जहां देखों वहीं खेल के बारे में तमाम तरह के खेल खेले जा रहे हैं. अठारह फीसदी इसलिए परेशान हैं कि झूठ में इतना हल्‍ला मचाया जा रहा है और जांच की बात की जा रही है, जबकि जांच के आंच से ना तो आज और ना ही कल कुछ पकना है. बीरबल की खिचड़ी शायद पहले पक जाए. और लगभग सत्‍तर प्रतिशत बेचारे खाने कमाने और महंगाई से लड़ने में परेशान हैं तो फिर आप कोई खेल करते रहो क्‍या फर्क पड़ता है!

कॉमनवेल्‍थ खेल के साथ हुआ खेल देखने के बाद मेरे मन में एक विचार आया है. क्‍यों न हम देश में भ्रष्‍टाचार को कानूनी मान्‍यता देने के लिए लड़ाई लड़ें. हम तो कहते हैं कि घोटालों को कानूनी मान्‍यता मिलनी चाहिए. अब तक देश ने इस विधा में जितनी काबिलेतारीफ प्रगति की है, उससे घोटालों का हक बनता है कि उन्‍हें कानूनी बनाया जाय और घोटालेबाजों का सम्‍मान किया जाय. घोटालेबाजों के लिए तमाम पुरस्‍कार रखें जाए. एक बात और कि इन पुरस्‍कारों में सेटिंग गेटिंग नहीं होनी चाहिए. जैसा कि तमाम भूषण और श्री जैसे पुरस्‍कारों के साथ होता रहा है! भ्रष्‍टाचार और घोटालों में भी अगड़ा, पिछड़ा, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का कोटा बनाया जाना चाहिए. इसमें अल्‍पसंख्‍यक और बहुसंख्‍यक श्रेणी भी होनी चाहिए. नेता लोगों को अल्‍पसंख्‍यक श्रेणी में और आम जनता को बहुसंख्‍यक श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए. अधिकारियों को पिछड़ा श्रेणी, सरकारी कर्मचारियों को अनुसूचित श्रेणी में रिजर्वेशन दिया जाना चाहिए. अगड़ा श्रेणी आम जनता के लिए सुरक्षित किया जाना चाहिए. सीबीआई जैसी संस्‍था को खतम करके ऐसी जांच एजेंसी का गठन किया जाना चाहिए जो बड़े से बड़े ईमानदारों को पकड़ कर सजा दिलवाए. सीबीआई भले बड़े बेईमानों को सजा दिला पाने में अक्षम रही हो पर उम्‍मीद है कि नई संस्‍था अपना कार्य कुशलता से कर सकेगी.
 
किसी ने चारा खाया, किसी ने अलकतरा खाया, किसी ने पूरी सड़क ही खा ली, कोई स्‍टाम्‍प डकार गया, किसी ने शेयर खाए, कोई पेड न्‍यूज खा रहा है, कोई ताबूत खा गया, कोई बाढ़ राहत खा गया, कोई जमीन खा गया, किसी ने सरकार संभालने-गिराने के लिए धन खा लिया, कोई टेलीफोन खाया, किसी ने शराब खाया, कोई यमुना एक्‍सप्रेस वे खा गया, तो कोई आय से अधिक धन खा गया, कमीशन तो ईमानदारी से लोग खाते ही रहते हैं. इतना खाने के बाद भी कहां कोई अनपच हुआ...? सब मिल बांटकर पचा लिया गया. आम जनता तो बेचारी खिलाने में ही परेशान रहती है, क्‍लर्क को खिलाया, अफसर को खिलाया, पुलिस को खिलाया, नेता को खिलाया, दलाल को खिलाया. इससे जाहिर होता है कि खाना और खिलाना अलग अलग समूह है. इसलिए दोनों को बराबरी का दर्जा देने के लिए एक बराबर कानून बनाया जाय. सीबीआई बेचारी आज तक खाने वाले समूह को नहीं पकड़ पाई, जब भी पकड़ा खिलाने वाले समूह को ही पकड़ा. इसलिए हम सीबीआई की जगह ऐसी संस्‍था बनवाने की बात कर रहे हैं, जो सिर्फ ईमानदार लोगों के खिलाफ जांच करे. ऐसी संस्‍था के पास सफलता की गारंटी होगी.
 
भ्रष्‍टाचार बढ़ाने के लिए सख्‍त से सख्‍त कानून बनाया जाए. हालांकि इसके लिए ज्‍यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, क्‍योंकि इसके जैसी तरक्‍की देश में किसी और की नहीं हुई है. इस बारे में मेरे कुछ स‌ुझाव हैं... ईमानदारी को गैर जमानती धाराओं में शामिल किया जाए. जो भी व्‍यक्ति ईमानदारी में लिप्‍त पाया जाए, उसे बिना वारंट गिरफ्तार करने का अधिकार होम गार्ड तक को दिया जाए. स्विस बैंक में धन जमा करने को कानूनी बनाया जाए. जिनका स्विस बैंक में पैसा जमा हो उन्‍हें सरकार की तरफ से तमाम सुविधाएं प्रदान की जाए. जो भ्रष्‍टाचार की श्रेणी में पिछड़ा या दलित हों उन्‍हें नियमानुसार आरक्षण दिया जाए. अल्‍पसंख्‍यक भ्रष्‍टाचारियों के लिए विशेष सुविधाएं प्रदान की जाए. इस तरह के प्रावधानों को मान्‍य किया गया तो मुझे पूरी उम्‍मीद है कि देश में गरीबी भी नहीं रहेगी. भ्रष्‍टाचार की राष्‍ट्रीय योजना लागू होने के बाद कोई गरीब नहीं बचेगा. जब वो बचेगा ही नहीं तो फिर गरीबी कहां रहेगी?
 
रही बात खेल की तो, पहले भी हमने काफी खेल देखे हैं. हॉकी में खेल देखा, बैडमिंटन में खेल देखा, क्रिकेट में भी देखा, और बहुत से खेलों में भी खेल देखा. मेरा यह भी स‌ुझाव है कि खेल संस्‍थाओं के शीर्ष पदों को नेताओं की बपौती घोषित कर दी जानी चाहिए. जिस तरह से एक-एक संस्‍था पर कई वर्षों से नेता जी लोग काबिज हैं उसे देखते हुए उनके मरने के बाद (क्‍योंकि जीते जी तो वो हटेंगे नहीं) उनके पुत्रों या पुत्रियों को ही उस खेल संस्‍था का पदाधिकारी बनाया जाए. हम पहले भी मानते रहे हैं कि खेल में पदक नहीं बल्कि भाग लेना सबसे महत्‍वपूर्ण होता है. तो हमारा मानना है कि सभी संगठनों को नेताओं के हवाले करके खिलाड़ियों और देशवासियों को भाग लेना चाहिए. खिलाड़ी खेलों का भला नहीं कर सकते. उन्‍हें कहां वह खेल आता है जो हमारे नेताओं को खेलना आता है? राजनीति की तरह खेल संस्‍थाओं के वरिष्‍ठ पदों के लिए भी आयु सीमा का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए. कब्र में पांव लटकने तक नेताओं को शीर्ष पद पर रहने का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए. आखिर खेल है तो खेल होना भी तो चाहिए. जय खेल जय खिलाड़ी !!!

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